Header Ads Widget

Responsive Advertisement

कैमरामैन और फोटोग्राफर... पत्रकारिता की रीढ़ की हड्डी



हम सैल्यूट करते हैं छायाकर चलचित्र पत्रकारों को, जिनका दर्द कोई नहीं जानता..?


ये पत्रकारिता की रीढ़ की हड्डी है जिसके बिना बड़े से बडे पत्रकार का आर्टिकल सिर्फ एक किताब में लिखी कहानी की तरह होता अगर कैमरामैन और फोटोग्राफर नहीं होते तो। आपने शायद कभी इनके मन की पीड़ा नहीं सुनी होगी रात दिन सिर्फ उन खबरों के लिए एक कर देते हैं जिनकी कहानी एक लेखक लिखता है जिसे आप पत्रकार कहते हैं। लेकिन इनसे ज्यादा सम्मान और इनसे ज्यादा मान सरकार, नेता, मंत्री और इनके खूद के संस्थान सिर्फ लेखक को देते हैं। जबकि लेखक के दो हजार पर एक छाया चित्र भारी होता है। लाश के ढेर पर भी ये अपनी मन की पीड़ा और कुंठा को अपने अंदर दबाकर काम करते है। इनके साथ खड़ा इनका पत्रकार मित्र दूर खड़ा होकर कहानी गढ़ता है। लेकिन

PRESS

उस पीड़ित का दर्द और उसकी यातना इन कैमरामैन और फोटोग्राफर मित्रों से ज्यादा कोई नहीं समझ सकता। कोरोना में श्मशान घाट पर जलती लाशों के दृश्य हों या बच्चों की मौत की चीख हो लेकिन इनके अंदर की और रात के सपनो में कानों के पास दर्दनाक आहट शायद इनसे बहेतर लेखक भी नहीं समझ सकता। लेकिन सबसे बड़े दुख की बात ये है कि इतना सब दर्द अपने अंदर लेकर भी ये कैमरामेन और फोटोग्राफर मित्र दिन रात भटकते रहते हैं। इनकी पीड़ा दर्द और इनकी चीख सुनने वाला कोई नहीं?

स्टेट हेड प्रेम सिंह राजपूत

Post a Comment

0 Comments